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बेटियां यूं ही रच-बस जाया नहीं करतीं

Meenu Meena

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेटियाॅं यूॅं ही रच-बस जाया नहीं करतीं
        
                                                    
                            

बेटियांँ यूँ हीं रच- बस जाया नहीं करतीं
दूसरों की जमीन पर पनप जाया नहीं करतीं
पूछो कभी उनसे उनके दिलों के हाल
ऐसे ही फल-फूलों से लद जाया नहीं करतीं

क्या-क्या झेलती रहती हैं जरा पूछो उनसे
क्या-क्या सहती रहती हैं जरा जानो उनसे
चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा सजाकर
दर्द उनके हिस्से का जरा समझो उनसे

पूछो उनसे कैसे विदा होती हैं बेटियांँ
सीने में सब कुछ कैसे समाती हैं बेटियांँ
एक अनजान कमरे से जिंदगी का सफर
किस तरह सहम-सहम शुरू करती हैं बेटियाँ

बेटियों के हिस्से में मायका नहीं है बेटियों के हिस्से में सासुरा नहीं है अपने को अपने में दफन करने की बेबसी
बेटियों की जहान में क्या कुछ भी नहीं है

बड़े-बड़े वादे और ढेर सारी कसमें हैं
ताउम्र निभाने के लिए अनगिनत रस्में हैं
कितनी उम्मीदें लगाते रहते हो तुम उनसे
आग में झुलसती हुई उसकी ही जिस्में हैं

बेटी बनकर बेटियों के दिलों में थोड़ा झाँको
दुनियादारी की तराजू में केवल मत आंँको
अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने की खातिर
भेड़-बकरियों की तरह यूॅं उन्हें मत हाँको

मायें कहतीं सुबह-सोकर आ जाना
पिता कहते छठे- छमाहे आ जाना
भौजाइयाँ कहतीं क्यों आओगी यहांँ
भाई कहता यज्ञ-प्रयोजन आ जाना

अपनों से अपमानित होतीं बेटियाँ
दूसरों से प्रताड़ित होतीं बेटियाँ
घर के बंद हुए दरवाजे देखकर
सिसकती-कलपती रोतीं बेटियाँ

यदि उसके मौन को समझ पाओगे
दर्द के सैलाब में खुद ही डूब जाओगे
महसूस करने की कभी कोशिश करना
बेटियांँ कैसे रचीं-बसीं, शायद जान पाओगे
5 महीने पहले
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