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हैरान हूं मैं

Meena Gopal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो कल तक बिछाते थे पलकें हमारी राहों में..
        
                                                    
                            
आज उन्हीं के बदले तेवर देख.. हैरान हूँ मैं!

सच की ज़बाँ पे ताले लगे हैं आज-कल..
झूठ का सजता स्वयंवर देख.. हैरान हूँ मैं!

कल तक तरसती थी ज़मीं जहां इक बूँद पानी को..
आज वहां सैलाब में डूबे शहर देख..हैरान हूँ मैं!

जिस बाग़बाँ ने सींचे थे...शजर बड़े प्यार से..
उसी के हाथों उजड़ते घर देख..हैरान हूँ मैं!

बदलते हुए दौर का मंज़र कहां तक बयां करूं..
अपनों के ही हाथों में ख़ंजर देख.. हैरान हूँ मैं!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
एक महीने पहले
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