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वीरांगना गाथा

Medha Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहां जौहर ज्वाला जलती थी ,वहां हंसी ठिठोली चलती थी
        
                                                    
                            
कैसी वो वीर क्षत्राणी थी ,चिता की सेज सजती थी


किये दुल्हन सा शृंगार चली ,मृत्यु को वर अपना मान चली
यहां ढोल नगाड़े बजते थे,वहां नृत्य अंगारे दिखाते थे

अश्रुधारा कभी वही नही, नयनों में दर्प का दर्पण था
वहां शत्रु सेना बड़ती थी,यहाँ मृत्यु की गोद बुलाती थीं

फिर उतर गयी अग्नि ज्वाला में, देह अलौकिक दमकती थी
क्षत्राणी नश्वर देहत्याग कर अमर लोक को चलती थीं

मेवाड़ी राजपूतानी थी ,पद्मावती नाम की रानी थी
जिसकी तो शान निराली थी,बलिदान की सच्ची कहानी थी।।


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