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मोहब्बत के बाज़ार मे

MD Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी अभी तो उतरे हैं मोहब्बत के बाज़ार में ,
        
                                                    
                            
धीरे धीरे तो खरीदारी आ ही जाएगी!

थोड़ा तेरी महफिलों में जलील होने तो दे ,
हममें भी कुछ खुद्दारी आ ही जाएगी!

नहीं परवाह हमको इसमे नफा नुकसान का,
पूंजी ना बनी भी तो कुछ उधारी आही जाएगी!

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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