रोज़ आती है ज़िंदगी हमसे मिलने
लौटा देते हैं
कहकर हम जरा काम में मसरूफ़ हैं
क्या पता कब बैठ कर चाय पियेंगे साथ में
कहीं यूँ ना हो रात हो जाये
और गुज़री शाम कहे उसे अफ़सोस है