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रोज़ आती है ज़िंदगी

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोज़ आती है ज़िंदगी हमसे मिलने
        
                                                    
                            
लौटा देते हैं
कहकर हम जरा काम में मसरूफ़ हैं
क्या पता कब बैठ कर चाय पियेंगे साथ में
कहीं यूँ ना हो रात हो जाये
और गुज़री शाम कहे उसे अफ़सोस है
15 घंटे पहले
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Ankit Kumar

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