रोज़ आती है ज़िंदगी हमसे मिलने
लौटा देते हैं
कहकर हम जरा काम में मसरूफ़ हैं
क्या पता कब बैठ कर चाय पियेंगे साथ में
कहीं यूँ ना हो रात हो जाये
और गुज़री शाम कहे उसे अफ़सोस है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X