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नाम ना दो जीने का

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर अलसाती सुबह की हस्ती को
        
                                                    
                            
बारिश से नहाती मिट्टी को
दोपहरी फुर्सत की उस झपकी को
ऊँचे पहाड़ों की खूबसूरत बस्ती को
बर्फ पर लोट कर बुलाती हर उस मस्ती को
समंदर से आवाज़ लगाती कश्ती को
जो इंतज़ार है तुम्हारी छुट्टी का
तो नाम ना देना अपने होने को ज़िंदा होने का
हाँफती सी इस दौड़ को ज़िंदगी जीने का
2 महीने पहले
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