मुनासिब सब कुछ अगर यूँ ही हुआ करता
हर अंधेरे के क़रीब कोई चिराग़ तो जला करता
हर सपना हकीकत से क्यों लड़ा करता
महल किं खिड़की से कोई झोपड़ा थोड़े ही दिखा करता