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मुनासिब सब कुछ अगर यूँ ही हुआ करता

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुनासिब सब कुछ अगर यूँ ही हुआ करता
        
                                                    
                            
हर अंधेरे के क़रीब कोई चिराग़ तो जला करता
हर सपना हकीकत से क्यों लड़ा करता
महल किं खिड़की से कोई झोपड़ा थोड़े ही दिखा करता
2 घंटे पहले
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