माँ के घर हूँ सपना सही पर आज मुझे जगना नहीं
आँखें भींच ली इस क़दर मैंने
अब इस घर से मुझे जाना नहीं
दिखा दें दुनिया खुशनुमा इतनी
ये उन खुली आँखों के बस का नहीं