माँ के घर हूँ सपना सही पर आज मुझे जगना नहीं
आँखें भींच ली इस क़दर मैंने
अब इस घर से मुझे जाना नहीं
दिखा दें दुनिया खुशनुमा इतनी
ये उन खुली आँखों के बस का नहीं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X