कहने वाले कह देते है,क्या रखा है गांव में ?
लेकिन मैं कहता हूँ प्यारे, सब कुछ है मेरे गांव में,
दूध-दही, छाछ और घी, मिलेगा मेरे गांव में,
ख़ूब गिलास भर-भर के पी, प्यारे सबके साथ में,
चारों ओर हरियाली मोहक, दिखती मेरे गांव में,
कहने वाले कह देते है,क्या रखा है गांव में ?
छोटी-छोटी गलियां और वो पुरानी टूटी हवेलियां,
खंडहर बने खड़े हुए वो, ऊंचे अट्टा और अटारियां,
इस विरासत को हैं सहेजे, पूर्वजों की याद में,
कहने वाले कह देते हैं, क्या रखा है गांव में ?
सहयोग और भाई-चारे की झलक, दिखती है मेरे गांव में,
काका, ताऊ, चाचा, बाबा, बैठते हैं नीम की छांव में,
हंसी-ठिठोली के साथ-साथ, ज्ञान की बातें होती हैं,
रामायण, गीता और भागवत, पर भी चर्चा होती है,
सादा-जीवन, उच्च-विचार को, रखते हैं सब ध्यान में,
कहने वाले कह देते हैं, क्या रखा है गांव में ?
सुबह-शाम चिडियों की चहक, गूंजती मेरे गांव में,
गाय और भैंस की मैं- मैं ,मुझको बहुत लुभाती है,
मुझको मेरे गांव की मिट्टी, याद बहुत ही आती है,
जिसने गांव कभी देखा ही नहीं, वे कहते कुछ नहीं गांव में,
लेकिन 'मयंक' कहता है प्यारे, सब कुछ है मेरे गांव में...
कहने वाले कह देते हैं क्या रखा है गांव मे ?
-मयंकेश कुमार दुबे