इक दिन मेरे घर के मीनार गिरेंगे,
एक दो नहीं पूरे चार गिरेंगे,
ये ईंट,पत्थर,चौखट ये द्वार गिरेंगे,
छत के साथ साथ मेरे ख्वाब गिरेंगे,
कुछ महलों के अंहकार गिरेंगे,
संभाले न संभले तो बाजार गिरेंगे,
तपती धूप में सायेदार गिरेंगे,
बीती यादों के हंसते संसार गिरेंगे,
इक दिन मुझको भी यहाँ से चले जाना है दोस्त,
रोयेगी तन्हाई जब ये घर बार गिरेंगे,
मेरी बुनियादे सच्चाई पर टिकी हैं "प्रदीप",
फिर उठ खड़े होंगे चाहे सौ बार गिरेंगे,