विज्ञापन

घर बार गिरेंगे

मास्टर प्रदीप खरक

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ‎इक दिन मेरे घर के मीनार गिरेंगे,
        
                                                    
                            
‎एक दो नहीं पूरे चार गिरेंगे,
‎
‎ये ईंट,पत्थर,चौखट ये द्वार गिरेंगे,
‎छत के साथ साथ मेरे ख्वाब गिरेंगे,
‎
‎कुछ महलों के अंहकार गिरेंगे,
‎संभाले न संभले तो बाजार गिरेंगे,
‎
‎तपती धूप में सायेदार गिरेंगे,
‎बीती यादों के हंसते संसार गिरेंगे,
‎
‎इक दिन मुझको भी यहाँ से चले जाना है दोस्त,
‎रोयेगी तन्हाई जब ये घर बार गिरेंगे,
‎
‎मेरी बुनियादे सच्चाई पर टिकी हैं "प्रदीप",
‎फिर उठ खड़े होंगे चाहे सौ बार गिरेंगे,
‎
‎
‎
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all