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घर बार गिरेंगे

                
                                                         
                            ‎इक दिन मेरे घर के मीनार गिरेंगे,
                                                                 
                            
‎एक दो नहीं पूरे चार गिरेंगे,
‎
‎ये ईंट,पत्थर,चौखट ये द्वार गिरेंगे,
‎छत के साथ साथ मेरे ख्वाब गिरेंगे,
‎
‎कुछ महलों के अंहकार गिरेंगे,
‎संभाले न संभले तो बाजार गिरेंगे,
‎
‎तपती धूप में सायेदार गिरेंगे,
‎बीती यादों के हंसते संसार गिरेंगे,
‎
‎इक दिन मुझको भी यहाँ से चले जाना है दोस्त,
‎रोयेगी तन्हाई जब ये घर बार गिरेंगे,
‎
‎मेरी बुनियादे सच्चाई पर टिकी हैं "प्रदीप",
‎फिर उठ खड़े होंगे चाहे सौ बार गिरेंगे,
‎
‎
‎
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3 महीने पहले

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