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अतृप्ति का व्याकरण

Maruti Suzuki

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमने शब्दों को निर्वासित नहीं किया—
        
                                                    
                            
पहले उनकी आत्मा का हनन किया,
फिर उन्हें उच्चारणों के कोलाहल में छोड़ दिया।
अब वे ध्वनियाँ हैं—

नाभि-विहीन, कुल-विहीन।

अधरों पर संवाद का प्रवेग है,
भीतर रिक्तता—
जिसने स्वयं को दिगंत घोषित कर दिया है।

दर्पण हमने ऊँचे और तिरछे टाँग दिए,
ताकि मुखौटे बचें,
दरारें नहीं।

सत्य की नग्न दीप्ति से त्रस्त होकर
हमने कृत्रिम आभा ओढ़ ली;

पर स्मृति के बंद कक्षों में उगता शैवाल
अब भी हमारी प्रतीक्षा करता है।

जयघोष के इस अरण्य में
मौलिक स्वप्न बधिर नहीं—
श्रान्त हैं।

जो सत्य की मद्धिम लय सुनता है,
विस्मृति की धूल
उसे पहले ढँकती है।

बोध अब सरिता नहीं—
क्षितिज पर काँपती मरीचिका है;
और हम,
अपनी ही अतृप्ति को तर्क कहकर
लौट आते हैं।

स्पर्शहीन सतहों पर फिसलती उँगलियाँ—
अनुभवों की आर्द्रता से च्युत,
हम सूचनाओं के पाषाण में जमते गए।

यह शब्दों का अकाल नहीं—
संवेदना का पतन है।

सूखा बाहर नहीं,
अंतस की मृदा में है।
आओ, परती चेतना पर
फिर से प्रतीक्षा बोएँ;
शब्दों को अर्थ की देह लौटाएँ,
और मौन को विस्तार दें।

इतिहास शोर से नहीं बनता—
वह उस एकाकी प्रज्ञा में आकार लेता है
जो एकांत में बैठकर
समय से प्रश्न करने का साहस रखती है!
- अनूपसत् शुक्ल
5 महीने पहले
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