इसी छोर पर तूफानों का मजमा लगता है
घर डूबते हैं लहरों में तो सदमा लगता है
अफ़सोस उस काफिर से कोई कुछ नहीं कहता
मेरी ही जुबां पर जाने क्यों फतवा लगता है
मारुफ आलम
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