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फतवा लगता है

                
                                                         
                            इसी छोर पर तूफानों का मजमा लगता है
                                                                 
                            
घर डूबते हैं लहरों में तो सदमा लगता है
अफ़सोस उस काफिर से कोई कुछ नहीं कहता
मेरी ही जुबां पर जाने क्यों फतवा लगता है

मारुफ आलम


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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