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ज़िंदगी के रंग

Mansoor Ansari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर ज़िंदगी जो सीधी लकीर होती
        
                                                    
                            
फिर कहा इसकी इतनी तक़रीर होती
समझौते से जिए समझौते से मिटे
कभी असूल कभी क़बूल की तासीर होती
तर्ज़ ए कार ने मसौदा दे दिया जीने का
अम्ल ओ आमाल से इसकी तहरीर होती
जो ख्वाबों को ना खुले आँखों से देखते
पैरों में आरज़ूओं की कहा जंजीर होती
गिर्या ए ग़म से जो ना उलझती कभी
फिर इस दिल की कहा ये तक़दीर होती
उम्र गुज़र ना जाये कश्मकश में मंसूर
मेहरबान होती दुनिया तो फिर किया तदबीर होती
 
2 महीने पहले
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