गर ज़िंदगी जो सीधी लकीर होती
फिर कहा इसकी इतनी तक़रीर होती
समझौते से जिए समझौते से मिटे
कभी असूल कभी क़बूल की तासीर होती
तर्ज़ ए कार ने मसौदा दे दिया जीने का
अम्ल ओ आमाल से इसकी तहरीर होती
जो ख्वाबों को ना खुले आँखों से देखते
पैरों में आरज़ूओं की कहा जंजीर होती
गिर्या ए ग़म से जो ना उलझती कभी
फिर इस दिल की कहा ये तक़दीर होती
उम्र गुज़र ना जाये कश्मकश में मंसूर
मेहरबान होती दुनिया तो फिर किया तदबीर होती
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