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एक ही धारा

Manshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम भागीरथी से शांत प्रिय,
        
                                                    
                            
मैं अलकनंदा सी चंचल हूं ॥

तुम्हारी गहराई में खो जाऊं,
तुम्हारे किनारे पर निकलूं ॥

तुम समंदर की गहराई जैसे,
मैं उसमें खो जाती हूं ॥

हैं छिपे हजारों शब्द मौन में तुम्हारे,
मेरी बातों में बहती लहर हजारों है ॥

तुम पहाड़ों जैसे हो अडिग प्रिय,
मैं उसमें झरनों सी बहती हूं ॥

तुम सहनशील हो, जैसे गहराई कोई शांत,
मैं जिद्दी हूं, लहरों सी तुमसे टकराती हूं ॥

और एक दिन ऐसा आएगा प्रिय,
जब सारी दूरियां मिट जाएंगी ॥

मिलकर हम देवप्रयाग बन जाएंगे,
जहां दो धाराएं एक संगम बन जाएंगी ॥

न तुम अकेले रहोगे, न मैं अकेली,
हमारा नाम होगा - एक ही धारा ॥

 
3 महीने पहले
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