आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक ही धारा

                
                                                         
                            तुम भागीरथी से शांत प्रिय,
                                                                 
                            
मैं अलकनंदा सी चंचल हूं ॥

तुम्हारी गहराई में खो जाऊं,
तुम्हारे किनारे पर निकलूं ॥

तुम समंदर की गहराई जैसे,
मैं उसमें खो जाती हूं ॥

हैं छिपे हजारों शब्द मौन में तुम्हारे,
मेरी बातों में बहती लहर हजारों है ॥

तुम पहाड़ों जैसे हो अडिग प्रिय,
मैं उसमें झरनों सी बहती हूं ॥

तुम सहनशील हो, जैसे गहराई कोई शांत,
मैं जिद्दी हूं, लहरों सी तुमसे टकराती हूं ॥

और एक दिन ऐसा आएगा प्रिय,
जब सारी दूरियां मिट जाएंगी ॥

मिलकर हम देवप्रयाग बन जाएंगे,
जहां दो धाराएं एक संगम बन जाएंगी ॥

न तुम अकेले रहोगे, न मैं अकेली,
हमारा नाम होगा - एक ही धारा ॥

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर