तुम भागीरथी से शांत प्रिय,
मैं अलकनंदा सी चंचल हूं ॥
तुम्हारी गहराई में खो जाऊं,
तुम्हारे किनारे पर निकलूं ॥
तुम समंदर की गहराई जैसे,
मैं उसमें खो जाती हूं ॥
हैं छिपे हजारों शब्द मौन में तुम्हारे,
मेरी बातों में बहती लहर हजारों है ॥
तुम पहाड़ों जैसे हो अडिग प्रिय,
मैं उसमें झरनों सी बहती हूं ॥
तुम सहनशील हो, जैसे गहराई कोई शांत,
मैं जिद्दी हूं, लहरों सी तुमसे टकराती हूं ॥
और एक दिन ऐसा आएगा प्रिय,
जब सारी दूरियां मिट जाएंगी ॥
मिलकर हम देवप्रयाग बन जाएंगे,
जहां दो धाराएं एक संगम बन जाएंगी ॥
न तुम अकेले रहोगे, न मैं अकेली,
हमारा नाम होगा - एक ही धारा ॥
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