मुद्दतों बाद ज़ुबां पे इक कलाम आया है
ज़हन में शायद फिर तेरा नाम आया है।
मैकदे में साकी भी मदहोश सा खड़ा है
ग़म मिटाने इधर इक निज़ाम आया है।
रूलाया था जिस बेवफा ने बेइंतहा कभी
यादों की बस्ती से उसका सलाम आया है।
होंठों को उम्र भर रही आरजू जिसकी
महबूब के नाम का अब वो जाम आया है।
तैरें कि डूब जायें इश्क के दरिया में
ज़िंदगी में अनोखा ये मकाम आया है।
मनोज यादव
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