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पतझड़ और वसंत

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उर के स्पंदन में
        
                                                    
                            
गुंजरित हो
कौन गा रहा गुंजन गान?
मेरे पतझड़ से जीवन की
सुधि ले,कौन भर रहा?
मेरे सांसों में प्राण
मेरे सांसों में प्राण।।

दिवस बीत गया
निशा जाग रही
तिमिर गहन में
कौन टिमटिमा रहा
मेरे दुःख के निलय में।।

प्रथम किरण भोर की
आशा के रंग में रंग कर आई
लिखने सौभाग्य के
मधुर क्षण अशेष
मधुर क्षण अशेष।।

उर के स्पंदन में
गुंजरित हो
कौन गा रहा गुंजन गान
कौन गा रहा गुंजन गान।।
-मनोज सिन्हा
एक वर्ष पहले
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