हे! विधिप्रिया वागेश्वरी
हे! सिद्धिदात्री हंशवाहिनी
वर दो वर दो वर दो
समग्र धरा को ज्ञान से भर दो
हम हैं शिशु बालवृंद निश्छल
तुम्हारे आंगन के
ज्ञान का संपूर्ण आशीष
हममें भर दो
हममें भर दो
वर दो वर दो वर दो।।
स्मृति थी सघन
मेघों सी
बरसी और विलुप्त हो गई
अब भरा है सूनापन
कब आओगे
एक संकेत तो दे दो।।
तारक श्रृंखला सी है
विद्यमान उर में अनगिनत
इच्छा और अभिलाषाएं
टिम टिमा रहीं हैं
उज्जवल ज्योत सी
आती नहीं भोर सी
जाती भी नहीं निशा बन।।
बेसुध पीड़ा सोती
भर जाती उर में क्षोभ
बह जाती
अश्रु बन
नैनों से ढ़लक कर
छोड़ जाती कपोलों के पथ
एक सूखी चिन्ह लकीर की।।
मुख्तसर सी बात है
अक्सरहां बातों में तुम
आ ही जाते हो
कभी गीत
कभी गजल बन
सबके दिल में उतर जाते हो।।
- मनोज सिन्हा