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मेरी अनुभूतियां

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सत्य से परे रहे
        
                                                    
                            
जो यथार्थ अभी तक
न जाने कब हमसे
दूर चले गए वे
अपनी निहितार्थ लेकर।।

पाना तो बहुत है
खोने को शेष कुछ नही है
जबसे मिथ्या मिली, हमसे
सत्य छोड़ गया हमें तभी से।।

शिखर को छूने की आकांक्षा
भला किसे नहीं है?
लेकिन दूर हो जाना मूल से
क्या बहुत जरूरी है?

वास्तविकता और बनावटीपन में
मात्र सूक्ष्म सा भेद है
यह अभेद्ध अब तक इसलिए है
क्योंकि! हम सभी मूल से दूर हैं।

घास,वृक्ष, नदियां और पहाड़
प्रकृति के हैं, विशिष्ट उपहार
वे मूल को पकड़े रहे, मौलिक रहे
तुम्हीं बताओ, हम कहां हैं ! खड़े

सोचना नितांत जरूरी है
अपने नीरव से जीवन के
मधुरतम एकांत में
जब वहां पहुंच जाओगे
तब कुछ पा ही जाओगे

पाने का अर्थ होगा
प्रकृति को स्वीकारना
स्वीकारने का तात्पर्य होगा
बनावटीपन को त्यागकर
मौलिकता को स्वीकारना।।
2 वर्ष पहले
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