मन का उद्वेग
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कामना को विस्मृत कर
करुणा के सौंदर्य में
रंग गई हूं मैं
वेदना नहीं सताती
मुझे अब
संतृप्त हो गई हूं मैं।।
चाहती हूं असीम हो जाना
सीमाबद्ध हो जाना मेरी चाह नहीं
जीवंत हूं यदि तो
सदृष्य ही दिखना चाहूंगी मैं।।
अनुभूतियों के पर्वत शिखर पर
खिले हैं सुमन अनेक
उनमें से कुछ झर गए
कुछ खड़े हैं डालों पे
स्वयं में आत्मसात कर
समस्त स्मृतियां अशेष
समस्त स्मृतियां अशेष।।
बंध हैं जीवन में अनंत
तारें भी हैं नभ में असंख्य
तारक पथ से दूर
शशि सुख से फूला समा न रहा
किरणें आती नहीं तारों से मुझ तक
गलगला कर भाव रह जाते एकाकी जीवन के पथ पर
मिलमिला कर अश्रुपूरित नयनों में अशेष।।
- मनोज सिन्हा
( 12.3.25)