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जल धारा

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बिंब नहीं तुम ,जल बिंदु हो
        
                                                    
                            
झर रहे झरने की अक्षय जल निधी हो
श्वेत शीतल ,इंदु सी चीतल
पहन कर हिम आवरण
अवतरित हो रही हो, तुम पर्वत से
तीव्र वेग में बलखाती हुई
सरिता बन सींच रही हो
संस्कृति सभ्यता के प्राचीरों को
साक्षी हैं ,इतिहास के पन्ने
भूलवश हैं, वे आंख मूंदें
परन्तु सोई नहीं है, वह
जागृत है ,जागृति बन कर
झर - झर कर समृद्ध कर रही
प्रकृति कानन के सभी लघु दीर्घ आंगन- प्रांगण।।
- मनोज सिन्हा
एक वर्ष पहले
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