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भावों का समागम

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्पर्शित कर जाता
        
                                                    
                            
जो भावों से नित्य
हृदय से नेह बरसा जाता है
प्रेम पंखुड़ियों से नहला कर
हमें सुवासित कर जाता है
वह आता है मेरे , समीप
समीर के झोंकों के संग
गुनगुनाकर मेरे कानों में
सुमधुर गीत सुना जाता है अनुपस्थित रहता वह किसी दिवस जब
तब वह मेरे स्मृति के नील गगन में
तारों सा टिमटिमाकर
अपनी उपस्थिति दे जाता है
छूता हो जो भावों से नित्य
हृदय से नेह बरसा जाता है
हृदय से नेह बरसा जाता है
फिर विस्मृत वह होता कभी नहीं
नैनों से उतर हृदय में बस जाता है
नैनों से उतर हृदय में बस जाता है।।

- मनोज सिन्हा
एक वर्ष पहले
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