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बह गए

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अश्क बहे
        
                                                    
                            
बिना कहे
जख्म दिल ने
कहां कहां न सहे?
जब -जब दिल- मन ने
चोटें खायीं
अश्क बहे
बिना कहे
बिना सुने।।

सुनने की
कोई बात नहीं
विरह जब पलता
मन की गोद में
तेरी राह
तकते तकते
थकता मन कहां?
आस रहता जहां
प्रतीक्षा में
होती सूनी
दो नैनों की
अप्रतिम धूनी
रमा जो बैठा
ठान कर
गवां वह बैठा
सारा कुछ
अपना ही जान कर
फिर भरते नयन
अश्रु - कण से
भरता हो धरा जैसे
वर्षा में जल -कणों से
फिर बह जाते वो
बिना कहे
बिना सुने।।

रोता है, मन
भीतर- भीतर
सुलगता हो काठ
जल- कर जैसे
अंतस की बातें
हृदय ही जाने
हृदय मन का कहा
क्यूं माने?
विछोह फिर दे जाते
नयनों से उमड़ कर
जल- मोतियों में
अवसादों के चिन्ह
कपोलों के पथ
बिना कहे
बिना सुने।।
- मनोज सिन्हा
2 वर्ष पहले
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