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अवचेतन की पुकार

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सहम-सहम कर
        
                                                    
                            
आते हैं, स्वप्न भी
मैं, देख रहा हूं
एक ही स्वप्न,
बार-बार
कई दिनों से
पूर्ण होने से पूर्व
खुल जाती हैं, पलकें
और मेरा स्वप्न
अधूरा ही रह जाता है।।
महसूस करता हूं,
संभवतः स्वप्न को
सींचना होगा
मन के भावों से
जोड़ना होगा, उसे
ह्रदय के तारों से
आमंत्रित करना होगा, उसे
प्रेम के पुकारों से
मन कहता है
मान जायेगा वह
और आएगा चुपके से, वह
तीसरे पहर
जब नींद के आग़ोश में
बंद होंगें नैन
फिर पूरे होंगें
स्वप्न के शेष बंध-उपबंध।।
3 वर्ष पहले
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