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अनवरत

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मिलते रहना राहों में
        
                                                    
                            
मानो महसूस हो
ज़िन्दगी चल रही
कदम-तालों सी
रूक जाना भी
कोई बात होगी?
पहाड़ों से देखा है, हमने
अलकनंदा, भागीरथी,
गंगा-जमुना को उतरते हुए
रुकीं कहां सारी नदियां
बह कर, दे रहीं है, जीवन
सतत, निरंतर, अविरल
स्वयं का स्वरूप बदलने से पूर्व
सागर में मिल जाने से पूर्व
पुनः मेघ बनने तक
चक्रवत बह रही निरंतर
यही तो मर्म है, जीवन का
रूक न जाने और बहते रहने का
रूक न जाने और बहते रहने का।।
3 वर्ष पहले
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