ज़ज्बात की दुनिया में ठिकाना ही नहीं,
इस दिल को तेरे बिन अब सुकूँ भी नहीं।।
हर ज़ख्म ने चुपके से मुझे शायर किया,
वरना मेरी आँखों में फ़सानाय ही नहीं।।
पत्थर भी पिघल जाएँ मेरे दर्द को सुनकर,
अफ़सोस किसी दिल में तराना ही नहीं।।
रिश्तों की चमक झूठ के बाज़ार में खोई,
सच्चाई का अब कोई ख़ज़ाना ही नहीं।।
हमने तो मोहब्बत को इबादत ही समझा,
नफ़रत से बड़ा कोई दिवाना ही नहीं।।
तू छोड़ गया, फिर भी तेरा नाम लिया है,
इस इश्क़ से बढ़कर तो ख़ज़ाना ही नहीं।।
तूफ़ान से लड़ते हुए सीखा है मुस्कुराना,
हालात से बढ़कर कोई उस्ताद ही नहीं।।
'एमके सिंह' लफ़्ज़ों में उतरते हैं ज़ज्बात,
सच्चे दिलों से बढ़कर ज़माना ही नहीं।।