आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पत्थर भी पिघल जाएँ मेरे दर्द..

                
                                                         
                            ज़ज्बात की दुनिया में ठिकाना ही नहीं,
                                                                 
                            
इस दिल को तेरे बिन अब सुकूँ भी नहीं।।

हर ज़ख्म ने चुपके से मुझे शायर किया,
वरना मेरी आँखों में फ़सानाय ही नहीं।।

पत्थर भी पिघल जाएँ मेरे दर्द को सुनकर,
अफ़सोस किसी दिल में तराना ही नहीं।।

रिश्तों की चमक झूठ के बाज़ार में खोई,
सच्चाई का अब कोई ख़ज़ाना ही नहीं।।

हमने तो मोहब्बत को इबादत ही समझा,
नफ़रत से बड़ा कोई दिवाना ही नहीं।।

तू छोड़ गया, फिर भी तेरा नाम लिया है,
इस इश्क़ से बढ़कर तो ख़ज़ाना ही नहीं।।

तूफ़ान से लड़ते हुए सीखा है मुस्कुराना,
हालात से बढ़कर कोई उस्ताद ही नहीं।।

'एमके सिंह' लफ़्ज़ों में उतरते हैं ज़ज्बात,
सच्चे दिलों से बढ़कर ज़माना ही नहीं।।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर