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तीन कविताएँ

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच कहें तो, मंजिल कभी नहीं आती है,
        
                                                    
                            
जिंदगी तो सफर ही सफर में कट जाती है,
आज चांद पर तो कल सूरज को छूना है,
तारों की गिनती तो कभी, पकड़ में नहीं आती है।1।

ज़ख्म कहीं से मिले,दवा खुद ही करनी पड़ती है,
चाहें न चाहें हम, दर्द खुद ही सहनी पड़ती है,
भ्रम है कि, दर्द भी बंटा करते हैं,
बोझ जिंदगी की, खुद ही ढोनी पड़ती है।2।

मेरे ज़ख्मों पर मरहम मत करना,
दूर हो जाऊं तो कभी गम मत करना,
मैं तो रमता जोगी हूं,मेरा क्या है,
मुझे चाहकर खुद पर सितम मत करना।3। 
4 घंटे पहले
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