आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तीन कविताएँ

                
                                                         
                            सच कहें तो, मंजिल कभी नहीं आती है,
                                                                 
                            
जिंदगी तो सफर ही सफर में कट जाती है,
आज चांद पर तो कल सूरज को छूना है,
तारों की गिनती तो कभी, पकड़ में नहीं आती है।1।

ज़ख्म कहीं से मिले,दवा खुद ही करनी पड़ती है,
चाहें न चाहें हम, दर्द खुद ही सहनी पड़ती है,
भ्रम है कि, दर्द भी बंटा करते हैं,
बोझ जिंदगी की, खुद ही ढोनी पड़ती है।2।

मेरे ज़ख्मों पर मरहम मत करना,
दूर हो जाऊं तो कभी गम मत करना,
मैं तो रमता जोगी हूं,मेरा क्या है,
मुझे चाहकर खुद पर सितम मत करना।3। 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर