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प्यार को जी रहा हूं

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिंदगी बीत रही है अभी तन्हाई में
        
                                                    
                            
प्यार को जी रहा हूं मैं तेरी रुसवाई में!

दमकती चांद से अभी शिकायत कुछ भी नहीं है,
सितारों की चमक से भी रिफाकत कुछ भी नहीं है,
फकीर बन गया हूं मैं तेरी जुदाई में
प्यार को जी रहा हूं मैं तेरी रुसवाई में!

महकती बाग की फूलों से रिश्ता कुछ भी नहीं है,
बंधी जो डालियां झूलों से रिश्ता कुछ भी नहीं है,
प्यार से लड़ रहे हैं प्यार की लड़ाई में
प्यार को जी रहा हूं मैं तेरी रुसवाई में।

सुबह की लाली किरणें भी मुझे अब भाती नहीं है,
सांझ बादामी गगन भी मुझे लुभाती नहीं है,
होंठों और धड़कनों की जोर हाथा पाई में,
प्यार को जी रहा हूं मैं तेरी रुसवाई में।।

गीत -बुलबुल अब कानों को भी अच्छी लगी लगती,
वन की मोर की ताने भी अब अच्छी नहीं लगती
स्वयं से हो रही है स्वयं की विदाई में,
प्यार को जी रहा हूं मैं तेरी रुसवाई में।।
एक महीने पहले
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