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कब जिंदगी की

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब जिंदगी की शाम ढले
        
                                                    
                            
कब आंखों में अंधेरा हो
यहां किसी को टिकना नहीं है
चाहे तेरा हो या मेरा हो।

चलो! रातों में फूल बिखेरें
हर सांसों में खुशबू हो
सूरज की किरणें भी महके
ऐसा उन्मुक्त सबेरा हो।

हंसी ठहाकों की बदरी से
झरे बूंदें एहसासों की
प्रेम सुधा की बरखा में
भीगे हमारा डेरा हो।

हम शिकायत तुम से करें
तुम शरारत हम से करो
मौसम जहां नजाकत की हो
ऐसी बस्ती में बसेरा हो।

खुदा भी हमसे हाथ मिलाए
इतना निर्मल मन बन जाए
मृदुल नयन की स्नेह अश्रु से
तन मधुबन घनेरा हो।।
2 महीने पहले
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