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कब जिंदगी की

                
                                                         
                            कब जिंदगी की शाम ढले
                                                                 
                            
कब आंखों में अंधेरा हो
यहां किसी को टिकना नहीं है
चाहे तेरा हो या मेरा हो।

चलो! रातों में फूल बिखेरें
हर सांसों में खुशबू हो
सूरज की किरणें भी महके
ऐसा उन्मुक्त सबेरा हो।

हंसी ठहाकों की बदरी से
झरे बूंदें एहसासों की
प्रेम सुधा की बरखा में
भीगे हमारा डेरा हो।

हम शिकायत तुम से करें
तुम शरारत हम से करो
मौसम जहां नजाकत की हो
ऐसी बस्ती में बसेरा हो।

खुदा भी हमसे हाथ मिलाए
इतना निर्मल मन बन जाए
मृदुल नयन की स्नेह अश्रु से
तन मधुबन घनेरा हो।।
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2 महीने पहले

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