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जो ख़ुद पे आए तो अपनी सजा बदल लेते हैं।

Manoj B

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहाँ लोग ज़रूरत पे ख़ुदा बदल लेते हैं,
        
                                                    
                            
असर न हो जो दुआ में, तो दुआ बदल लेते हैं।

छुपाने अपनी खताओं को इस ज़माने में,
लिबास-ए-इश्क़ पहनकर, वफ़ा बदल लेते हैं।

ज़रा सा दर्द जो ठहरे सुकून की ख़ातिर,
मरीज़-ए-वक़्त भी अपनी दवा बदल लेते हैं।

कठिन जो लगने लगे मंज़िलें तो घबरा कर,
सफ़र के बीच मुसाफ़िर अपना पता बदल लेते हैं।

कुसूरवार तो ठहराते हैं ज़माने को,
जो ख़ुद पे आए तो अपनी सजा बदल लेते हैं।

हमें अज़ीज़ है ये मुफ़लिसी भी ग़ैरत से,
अमीर-ए-शहर तो अपनी अदा बदल लेते हैं।

खड़े हैं अपने उसूलों पे हम फ़क़ीर-मिज़ाज,
वो और होंगे, जो रहबर और राह बदल लेते हैं।
- मनोज भटकर 
एक घंटा पहले
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