वादें करना इन्सान की फितरत होती है
पर निभाना पता नहीं
वादें वो इनते शान से करते हैं
इतने विनम्र हो कर करते हैं
एक पल को लगता है
जिंदगी में जिंदगी मिल गई
जब निभाने का वक्त आता है
तो कौन जाने वादें किसने किया था
कब किया था कौन किया था कहां किया था
यकीन नहीं होता जनाब
पर ये जिंदगी है
यहां ये सब होती ही है
यकीन तो करना पड़ेगा
ऐसा सच में होता है
फिर भी यकीन नहीं होता है
इंतज़ार कीजिए सच में?
मनमोहन सिंह
दरभंगा बिहार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।