लफ्जों पर मेरे पहरा नहीं था
ज़मीर तेरा भी बहरा नहीं था
मौसम की तरह बदला तू तो
रंग तेरा कभी गहरा नहीं था
हर दौर में रहे यही तेवर
बदला कभी चेहरा नहीं था
गर्दिशों से था पुराना नाता
तन्हाई में भी तन्हा नहीं था।
-मं शर्मा