आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

लफ्जों पर मेरे पहरा नहीं था

                
                                                         
                            लफ्जों पर मेरे पहरा नहीं था
                                                                 
                            
ज़मीर तेरा भी बहरा नहीं था
मौसम की तरह बदला तू तो
रंग तेरा कभी गहरा नहीं था

हर दौर में रहे यही तेवर
बदला कभी चेहरा नहीं था
गर्दिशों से था पुराना नाता
तन्हाई में भी तन्हा नहीं था।
-मं शर्मा 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर