विज्ञापन

सिर्फ जीतना चाहता है, हड़पना चाहता है।

Manju Saklani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्त्री मन भी अजीब होता है
        
                                                    
                            
जिसमें स्वतंत्रता, स्वच्छंदता भी होती है
तो कई बंधन भी उसे प्रिय होते हैं
जिन्हें वह हमेशा बांधे रखना चाहती है।

उसमें अपनत्व भी होता
तो ममत्व भी होता है
प्रेम भी तो मोह भी होता
आसक्ति की भावना भी होती है
तो विरक्ति से भी परे न ही होती है।
वह कोमलता, कठोरता का
एक सम्मिश्रण धातु से बनी
कामनाओं और महत्वाकांक्षाओं
में भी परम साधु होती है।

बड़े-बड़े विद्वानों ने ऋषि- मुनियों
ने स्त्री मन पर अपना आधिपत्य करना चाह
लेकिन उसकी तह तक भी जान न सके
और हार स्वीकार न करने की स्थिति में
उसपर तिरिया चरित्र का लांछन लगा बैठे।

स्त्री वो नहीं जो तुम चाहते हो
स्त्री वह है जो वह चाहती है
पुरुष से प्रेम करती, प्रेम चाहती है।
शासन करना, शोषित होना नहीं चाहती।

जबकि पुरुष तो अभिमान से भरा
सिर्फ जीतना चाहता है, हड़पना चाहता है।
कभी संघर्ष करके भी हारना नहीं चाहता
अहम से हारे हुए तो स्त्री को भाते हैं।
स्त्री मन की यही अजीब ग्रंथि होती
जो किसी को नहीं भाती है।
वह उसी को चाहती है,
अहम त्याग कर जो भाव का दान करें
उसको बनाने और मिटाने का
सामर्थ्य उसकी भुजाओं में होता है।
स्त्री ने जिसको मिटाया
आज तक कब वह आबाद हुआ
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile