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बदलते आवरण और पर्यावरण

Manju Saklani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी जगह
        
                                                    
                            

बदलते आवरण और पर्यावरण
में बहुत कुछ बदल चुका है।
बारिश तब भी होती थी
बारिश अब भी होती है।
तब कृषक अधीर होता था
गिरती बूंदों को देखकर धीर धरता है।
ये बरसात यह सावन
तब अनहद अनगढ़ था।
किसी की सीमाओं में बाँधता नहीं था।
झूमने, गाने और खेत में रोपाइ लगाने का,
सबका अपना ही अलग आनंद था।
प्रकृति तो अपने जीवन का सार थी।

अब प्रकृति पर शासन करने वालों की
प्रकृति शासन से सबक सिखाती है।
वह किसी का कुछ नहीं लेती है
वह तो अपने स्थान पर लौट आती है
उसकी जगह ,जंगल ,जमीन हड़प कर
इंसान उसका स्वामी बन बैठा है ।
इसका स्वामित्व मिटाकर
वह जगह खाली करवाती है।
विकराल, क्राँतिकारी भयावह रूप प्रकृति का
सब के लिए विध्वंशकारी बन जाती हैं।
एक महीने पहले
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