अपनी जगह
बदलते आवरण और पर्यावरण
में बहुत कुछ बदल चुका है।
बारिश तब भी होती थी
बारिश अब भी होती है।
तब कृषक अधीर होता था
गिरती बूंदों को देखकर धीर धरता है।
ये बरसात यह सावन
तब अनहद अनगढ़ था।
किसी की सीमाओं में बाँधता नहीं था।
झूमने, गाने और खेत में रोपाइ लगाने का,
सबका अपना ही अलग आनंद था।
प्रकृति तो अपने जीवन का सार थी।
अब प्रकृति पर शासन करने वालों की
प्रकृति शासन से सबक सिखाती है।
वह किसी का कुछ नहीं लेती है
वह तो अपने स्थान पर लौट आती है
उसकी जगह ,जंगल ,जमीन हड़प कर
इंसान उसका स्वामी बन बैठा है ।
इसका स्वामित्व मिटाकर
वह जगह खाली करवाती है।
विकराल, क्राँतिकारी भयावह रूप प्रकृति का
सब के लिए विध्वंशकारी बन जाती हैं।