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जब तुम सामने आए प्रेम गीत

Manju Dushyant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तुम सामने आए
        
                                                    
                            
विरह की सूखी नदी में
अचानक सावन उतर आया,
तुम आए तो मेरे भीतर
एक अधूरा गीत मुस्काया।
बरसों से बंद पड़ी थीं
मन की वीणा की तानें,
तुमने छेड़ा मौन का तार
जाग उठीं सोई पहचानें।
जैसे मरुभूमि की छाती पर
पहली बूँद ने स्वर पाया,
तुम आए तो मेरे भीतर
एक अधूरा गीत मुस्काया।
तुम्हारी आँखों में ठहरा
कोई अनकहा निमंत्रण,
मेरी पलकों पर काँपा
सदियों का संचित स्पंदन।
दो नदियाँ थीं मौन खड़ीं,
बीच न कोई घाट रहा,
दृष्टि मिली तो लगा अचानक—
सारा अंतर पाट रहा।
तुमने मेरा नाम लिया तो
जैसे शंख बजे अंतर में,
जैसे बंद कली खुल जाए
सावन की पहली लहर में।
मेरी साँसों की देहरी पर
तुम्हारा मौसम आया,
विरह की सूखी नदी में
अचानक सावन उतर आया।
जो शब्द अधर तक आकर
वर्षों से लौट गए थे,
आज तुम्हारी एक दृष्टि में
सब अर्थ नए हो गए थे।
मौन हमारा बोल उठा था
बिन भाषा, बिन वाणी के,
जैसे दीपक पहचान ले लौ
अपने ही दीवाने की।
तुम पास खड़े थे—इतने पास,
फिर भी कितना संकोच था,
स्पर्श से पहले धड़कनों में
एक अदृश्य-सा लोच था।
जैसे दो तट वर्षों बाद
जल के सम्मुख आए हों,
जैसे बिछुड़े हुए परिंदे
अपने नभ को पाए हों।
मैंने आँखें उठाकर देखा—
तुममें अपना कल था,
तुमने मेरी चुप्पी पढ़ ली—
उसमें पूरा जीवन था।
एक मिलन ने कितने जन्मों
का संशय हर लिया,
सूने मन के आँगन ने फिर
जीवन का स्वर भर लिया।
अब न कोई प्रश्न बचा है,
न उत्तर की चाह रही,
तुममें मिलकर मेरी अपनी
मुझसे ही पहचान हुई।
प्रेम हमारे बीच नहीं था—
हम दोनों में बहता था,
जैसे मिट्टी में गंध छिपी हो,
जैसे बीज में वन रहता था।
आज मिलन की इस बेला में
बस इतना स्वीकार करो—
मेरी मौन प्रतीक्षाओं को
सुकून भरा अभिराम दे दो।।
- मंजू यादव
2 घंटे पहले
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