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ममता का क्रंदन

Manju Chiller

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिवस बालकनी में थी खड़ी
        
                                                    
                            
चौपहिया वाहन आकर रुकी
देखकर उसको मेरी उत्सुकता बढ़ी
जिस पर मेरी दृष्टि पड़ी
वह कटघरे में थी खड़ी
देखकर उसका धवल रंग
मेरा हृदय भी हुआ भंग
देखते ही देखते नयनों से
अब गौ- नंदन है छूट चला
माँ को जाते देख वह अबोध,
व्याकुल होकर पीछे दौड़ पड़ा।
देखा उसको रोते- बिलखते
क्रंदन स्वर भी गूंज रहा
मैं रह गई देखती उसको
मानों कोई ठूंठ खड़ा
हाय!ये कैसी विडम्बना है।
चाह कर भी न छूटा सकी
शिक्षित समाज में रहकर भी
मारी गई है सबकी मति,
ममता का मूल्य न समझ सके,
करुणा भी अब मौन खड़ी ।
ज्ञान बढ़ा, विज्ञान बढ़ा, पर
मनुष्यता विकलांग खड़ी।।
-मंजू छिल्लर
2 महीने पहले
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