एक दिवस बालकनी में थी खड़ी
चौपहिया वाहन आकर रुकी
देखकर उसको मेरी उत्सुकता बढ़ी
जिस पर मेरी दृष्टि पड़ी
वह कटघरे में थी खड़ी
देखकर उसका धवल रंग
मेरा हृदय भी हुआ भंग
देखते ही देखते नयनों से
अब गौ- नंदन है छूट चला
माँ को जाते देख वह अबोध,
व्याकुल होकर पीछे दौड़ पड़ा।
देखा उसको रोते- बिलखते
क्रंदन स्वर भी गूंज रहा
मैं रह गई देखती उसको
मानों कोई ठूंठ खड़ा
हाय!ये कैसी विडम्बना है।
चाह कर भी न छूटा सकी
शिक्षित समाज में रहकर भी
मारी गई है सबकी मति,
ममता का मूल्य न समझ सके,
करुणा भी अब मौन खड़ी ।
ज्ञान बढ़ा, विज्ञान बढ़ा, पर
मनुष्यता विकलांग खड़ी।।
-मंजू छिल्लर