रोती, सिसकती, अबला घर मे!
दुनिया कहे, संस्कारी है!
काम, काज जो बाहर करतीं!
कहे समाज, व्यभिचारी है!
कदम, कदम पे, भेड़िये बैठे,
गली, गली मे शिकारी है!
पीर न समझे, इनका कोई,
बड़ी अजीब, लाचारी है!
जिन चरणन मे, शीश झुकाती!
उसी हृदय को, ये ना भाँती!
भाति भाँति के, यतन करे, पर
उन्हे आजीवन ये, न सुहाती!
छलनी हृदय, लोचन मे आंसू!
मृदुल, कहें, यह "नारी" है!