दिल दरिया, बाकी सब समंदर है,
इन लहलहाती फसलों पे मत जा,
ये जमीन अंदर से बंजर है।
हुस्न की कातिलाने मुस्कानों पे, मर जाते है, लोग,
ये मुस्कान नहीं, ज़हर बुझा, खंज़र है।
खूबसूरत इमारतों को देख, हो जाता है, धोख़ा,
नक्काशियाँ तो ठीक, मगर दरो दीवार इनके, जर्जर है।
इल्म और तालीम से पहले बनती थी, शख्सियत, आज कल नहीं,
आज कल शख्सियत वही बनती है, जिस पे हुकमरान की नज़र है!
सियासत है, एक रंग मंच, जहाँ, अवाम नाचती है,
जम्हूरियत मे आदमी, इंसान नहीं, बंदर है।
ये तबाही जो देखते हो आस, पास, दूर दूर तक!
ये इत्तेफाक नहीं कोई, ये आने वाले वक़्त का, एक छोटा सा मंज़र है।