विज्ञापन

हुस्न की कातिलाने मुस्कानों पे, मर जाते है, लोग

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल दरिया, बाकी सब समंदर है,
        
                                                    
                            
इन लहलहाती फसलों पे मत जा,
ये जमीन अंदर से बंजर है।

हुस्न की कातिलाने मुस्कानों पे, मर जाते है, लोग,
ये मुस्कान नहीं, ज़हर बुझा, खंज़र है।

खूबसूरत इमारतों को देख, हो जाता है, धोख़ा,
नक्काशियाँ तो ठीक, मगर दरो दीवार इनके, जर्जर है।

इल्म और तालीम से पहले बनती थी, शख्सियत, आज कल नहीं,
आज कल शख्सियत वही बनती है, जिस पे हुकमरान की नज़र है!

सियासत है, एक रंग मंच, जहाँ, अवाम नाचती है,
जम्हूरियत मे आदमी, इंसान नहीं, बंदर है।

ये तबाही जो देखते हो आस, पास, दूर दूर तक!
ये इत्तेफाक नहीं कोई, ये आने वाले वक़्त का, एक छोटा सा मंज़र है।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

kamal jha

90 कविताएं

View Profile