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रोज सवेरे

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            होते रोज सवेरे, कागा बोले अंगना मोरे,
        
                                                    
                            

नव विहान की पावन बेला, ड्योढी पर चिड़ियों का मेला,
सतरंगी किरणों का खेला, शीतल पवन का चलता रेला,

रंग बिरंगे फूलों पर, भंवरे डाले डोरे,
कागा बोले अंगना मोरे।

छत पर बैठी मैना रानी, फुदक फुदकती गौरेया सयानी,

उजियारा फैला चहुं ओरे,
कागा बोले अंगना मोरे।

सुबह की आभा लगती ऐसी, 
नई नवेली दुल्हन जैसी,
निर्मल मन और चंचल काया,

हृदय है कोरे कोरे,
होते रोज सवेरे, कागा बोले अंगना मोरे।
 
2 वर्ष पहले
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samarth dalela

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