मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूँ
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूं
चाँद के कुछ बारीक अंश
जो बुझा सकें मेरे बदन
पे जलते हुए लाल सूरज को
जो धीरे -धीरे मुझे राख कर रहा है।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूँ
रंजनीगंधा और चमेली के
कुछ महकते हुए सफेद फूल
जो बेरंग ज़िन्दगी के जूड़े का
कर सकें सोलह श्रृंगार।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूँ
रात्रि के अंतिम पहर तक जगने वाले
रौशनी के पुंज जुगनुओं को
जो चीर सके मेरी आँखों में जमे
हज़ारों वर्षों के कालेपन को।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूं
बेरहमी से नदी की आवाज़ दबाकर
पहाड़ से गिरते हुए झरने को
जो मेरे मन के एक खास हिस्से पे
लगातार चोट करने का हौसला रखता हो।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूँ
अडिग अविचल हिम श्रृंखलाओं को
जो वक़्त के घाव को सीने पे लेकर भी
वज़्र स्वरूप में खड़ी है मेरे सामने
यही सिखा सकती हैं आँसू पीना मुझको ।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूँ
तुमको मेरी जानां
तुम्हारे हाथों के कंगन से झांककर
देखना चाहता हूँ समंदर में मिलते हुए सूरज को
तुम्हारी पायल और कान की बालियों से उपजे
स्वर में महसूस करना चाहता हूँ जीवन का संगीत
तुम्हारी मुस्कान से क्लिक करना चाहता हूँ
गुज़रते हुए हर एक सेकेंड को
तुम्हारे बदन के हरेक उतार चढ़ाव से गुज़रकर
ज़िन्दगी और खुशी के फासले को
शून्य करना चाहता हूँ मैं।
मैं खुद में जोड़ लेना चाहता हूं
वो सब कुछ जो हर पल टूटते हुए
मेरे मिट्टी के जिस्म को
वक़्त से पहले बिखर जाने से बचा सके।
- मनीष पाण्डेय 'आशिक़'
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