उंगलियाँ, उठती है, जो मुझ पर,
वो मुझे, भाँती है,
ज्यादा न सही, इस देश मे,
मेरी भी, थोड़ी ख्याति है।
हर वो आवाज, जो करती है, मुखाल्फत मेरा,
हुनर लिखने का नया रोज़ एक, सिखाती है।
खुद की पहचान बनाने मे, लगे मुझे बरसों,
यही पहचान मेरी, सौ शख्सियत को खा जाती है
समय के साथ चले जो, वही जिंदा है,
उन्ही के कदमो मे, जिंदगी भी, सर नवाती है।
मै तो एक सोच हूँ, सोच मे रखा क्या, है!
शख्सियत बन न जाए, सोच, मुझे डराती है!